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गोपाला

 गाय की सजल , कजरारी , ममतामयी आंखें सहज ही किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं| बचपन से ही गाय के प्रति मेरा विशेष प्रेम रहा है| गौ माता के प्रति यही प्रेम भाव आगे चलकर मेरे बेटे में भी देखने को मिला| जब वह छोटा था तो घर के सामने से निकलने वाली हर छोटी बड़ी गाय को गगा- गगा कहकर बुला लिया करता| मुझे आज भी वह दिन अच्छे से याद है , जिस दिन , उन्हीं में से एक गाय ने हमारे गेट पर ही एक बेहद ही सुंदर धवल शिशु को जन्म दिया था| जिस प्रकार एक बच्चा नया खिलौना  पाकर खुश होता है ठीक उसी प्रकार मेरे बेटे की खुशी का तो मानो कोई ठिकाना ही नहीं था| गाय का वह बच्चा  मेरे बेटे के लिए एक  नए खिलौने समान  ही था| सावन का महीना लग चुका था| एक दिन जो बारिश की झड़ी लगी तो मानो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी| यह देखकर मेरे बेटे को गाय के उस नवजात शिशु की चिंता सताने लगी| वह कहने लगा कि लगातार हो रही बारिश में तो वह छोटा सा बच्चा बीमार हो जाएगा| वह निरंतर जिद करने लगा कि जब तक बरसात नहीं रुक जाती , क्यों न गाय और उसके बच्चे को हम लोग अपने घर में ही रख लें? कहीं ना कहीं, मन ही मन में...

मेरा इडली प्रेम

 पिछले दो ब्लॉग में मार्मिक प्रसंग प्रस्तुत करने के पश्चात , आज मैं आपके समक्ष हास्य पुट से परिपूर्ण एक संस्मरण लेकर प्रस्तुत हूं| तो आइए, समय के पहिए को 11 वर्ष पीछे की ओर घुमाते हैं| यह उन दिनों की बात है जब मैं पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से एम .एड. कर रही थी| मेरा बेटा उस समय मात्र 5 वर्ष का था और कक्षा एक का छात्र हुआ करता था| देखने में हम मां बेटे बेहद दुबले-पतले से प्राणी थे| उन्हीं दिनों हमारे यहां एक नए किराएदार का आगमन हुआ| उनकी श्रीमती जी मेरी हम उम्र  थीं एवं उनके दोनों पुत्र मेरे बेटे के हम उम्र थे| वे बड़ी ही मिलनसार एवं सामाजिक प्रवृत्ति की महिला थीं| वह अक्सर ही कॉलोनी की अन्य श्रीमतीयों को अपने यहां चाय नाश्ते पर आमंत्रित करती रहती थीं| इसी श्रंखला में एक दिन उन्होंने मुझे , मेरी जेठानी, भतीजे और बेटे समेत आमंत्रित किया| बड़े ही उत्साह पूर्वक उन्होंने बताया कि, इडली बना रही हूं आइएगा जरूर |किसी कारणवश जेठानी और भतीजा जाने में असमर्थ थे तो मैं अपने बेटे   को लेकर ठीक समय पर पहुंच गई| आरंभिक औपचारिकता के बाद उन्होंने अत्यंत ही मनोरम सुसज्जित प्ले...

मां

 मैडम !आपकी इंग्लिश भाषा पर पकड़ बहुत अच्छी है |अपने सहकर्मी द्वारा कहे गए ये शब्द सुनकर मुझे अत्यंत गौरवान्वित महसूस  हुआ  एवं मैंने उस को धन्यवाद कहा |परंतु अंग्रेजी भाषा में मेरी दक्षता का श्रेय ना तो पूर्ण रूप से मुझे जाता है और ना ही मेरे अध्यापक -अध्यापिकाओं को| इसका सम्पूर्ण श्रेय जाता है तो सिर्फ मेरी मां को|  ऐसा हरगिज़ नहीं है  कि अंगरेजी भाषा का ज्ञान मुझे मेरी मां से प्राप्त हुआ हो, क्योंकि मेरी मां की स्वयं  की शिक्षा-दीक्षा हिंदी माध्यम से ही पूर्ण हुई थी परंतु ,मेरी अंग्रेजी में दक्षता के पीछे मेरी मां का ही हाथ है| रूढ़िवादिता एवं पूर्वाग्रह से ग्रसित कुछ पड़ोसी एवं रिश्तेदार मां से अक्सर कहा करते थे कि ,क्यों अपनी लड़की को इतने महंगे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाती हो ?क्यों नहीं उसको भी मोहल्ले की अन्य लड़कियों की तरह  हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूल में भेजती? जहां शिक्षा शुल्क भी कम है |तब मेरी मां उनसे सिर्फ यह कहती कि वह अपने बेटे और बेटी में कोई भेदभाव नहीं करती एवं जिस तरह की शिक्षा दीक्षा उन्होंने अपने दोनों बेटों के लिए सुनिश्चित की थी...

स्नेह

 अचानक से आंख खुली तो नज़र सीधे दीवार पर लगी हुई घड़ी पर जाकर  टिकी | बाप रे ! सुबह का 9:30 बज रहा था, बगल में देखा तो भतीजी भी सोई पड़ी थी  | रोजाना तो  भैया  सुबह 7:30 बजे ही उसे उठा दिया करते थे |फिर आज अभी तक क्यों सोई पड़ी है? सहसा मस्तिष्क में ख्याल आया   कि कहीं इसलिए तो नहीं कि मेरी नींद में खलल ना पड़े, क्योंकि आज मेरा मायके में आखिरी दिन है  |कल तो मुझे ससुराल चले जाना है और वहां की जीवन शैली के अनुरूप ही अपनी दिनचर्या सुनिश्चित करनी है |यह एक भाई का स्नेह ही है जो जताया नहीं जा सकता है, सिर्फ एक बहन के द्वारा महसूस ही किया जा सकता है|