मेरा इडली प्रेम

 पिछले दो ब्लॉग में मार्मिक प्रसंग प्रस्तुत करने के पश्चात , आज मैं आपके समक्ष हास्य पुट से परिपूर्ण एक संस्मरण लेकर प्रस्तुत हूं| तो आइए, समय के पहिए को 11 वर्ष पीछे की ओर घुमाते हैं| यह उन दिनों की बात है जब मैं पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से एम .एड. कर रही थी| मेरा बेटा उस समय मात्र 5 वर्ष का था और कक्षा एक का छात्र हुआ करता था| देखने में हम मां बेटे बेहद दुबले-पतले से प्राणी थे| उन्हीं दिनों हमारे यहां एक नए किराएदार का आगमन हुआ| उनकी श्रीमती जी मेरी हम उम्र  थीं एवं उनके दोनों पुत्र मेरे बेटे के हम उम्र थे| वे बड़ी ही मिलनसार एवं सामाजिक प्रवृत्ति की महिला थीं| वह अक्सर ही कॉलोनी की अन्य श्रीमतीयों को अपने यहां चाय नाश्ते पर आमंत्रित करती रहती थीं| इसी श्रंखला में एक दिन उन्होंने मुझे , मेरी जेठानी, भतीजे और बेटे समेत आमंत्रित किया| बड़े ही उत्साह पूर्वक उन्होंने बताया कि, इडली बना रही हूं आइएगा जरूर |किसी कारणवश जेठानी और भतीजा जाने में असमर्थ थे तो मैं अपने बेटे   को लेकर ठीक समय पर पहुंच गई| आरंभिक औपचारिकता के बाद उन्होंने अत्यंत ही मनोरम सुसज्जित प्लेट में   इडली सांभर हमारे समक्ष प्रस्तुत किया| बचपन से ही दक्षिण भारतीय पकवान मेरा प्रिय भोजन रहा है, अतः बिना समय व्यर्थ किए हम मां पुत्र शुरू हो गए| देखते ही देखते हम दोनों चार -चार इडली खा गए| एक अच्छे मेहमान नवाज की भूमिका का निर्वाह करते हुए वे पुनः इडली  परोसने आई|  मैंने भी एक  सभ्य  मेहमान की भांति,  ऊपरी तौर पर मना किया परंतु वह प्रेम पूर्वक आग्रह कर हम दोनों की ही प्लेटों में इडली डाल गईं| उसके बाद यह क्रम चलता रहा| वे   परोसती गईं और  हम   मां बेटा खाते गए| थोड़ी देर बाद जब मन ही मन में गिनना शुरू किया तो पाया की हम दोनों ही तकरीबन 25-25 इडली डकार चुके थे| अब अपने आप में थोड़ी शर्मिंदगी सी महसूस हुई| वे पुनः इडली लेकर आई तो मैंने ऊपरी तौर पर  बड़े ही बेमन से मना किया| उन्होंने भी आग्रह नहीं किया और बेहद ही फुर्ती से प्लेट वापस ले गईं| घर आकर जब यह पूरा वृतांत मैंने अपने परिवार के सभी सदस्यों को सुनाया तो उनका मुंह खुला का खुला रह गया और वे अपनी हंसी नहीं रोक पा रहे थे|

    धन्यवाद|

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