गोपाला

 गाय की सजल , कजरारी , ममतामयी आंखें सहज ही किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं| बचपन से ही गाय के प्रति मेरा विशेष प्रेम रहा है| गौ माता के प्रति यही प्रेम भाव आगे चलकर मेरे बेटे में भी देखने को मिला| जब वह छोटा था तो घर के सामने से निकलने वाली हर छोटी बड़ी गाय को गगा- गगा कहकर बुला लिया करता| मुझे आज भी वह दिन अच्छे से याद है , जिस दिन , उन्हीं में से एक गाय ने हमारे गेट पर ही एक बेहद ही सुंदर धवल शिशु को जन्म दिया था| जिस प्रकार एक बच्चा नया खिलौना  पाकर खुश होता है ठीक उसी प्रकार मेरे बेटे की खुशी का तो मानो कोई ठिकाना ही नहीं था| गाय का वह बच्चा  मेरे बेटे के लिए एक  नए खिलौने समान  ही था| सावन का महीना लग चुका था| एक दिन जो बारिश की झड़ी लगी तो मानो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी| यह देखकर मेरे बेटे को गाय के उस नवजात शिशु की चिंता सताने लगी| वह कहने लगा कि लगातार हो रही बारिश में तो वह छोटा सा बच्चा बीमार हो जाएगा| वह निरंतर जिद करने लगा कि जब तक बरसात नहीं रुक जाती , क्यों न गाय और उसके बच्चे को हम लोग अपने घर में ही रख लें? कहीं ना कहीं, मन ही मन में मुझे भी गाय और उसके बच्चे की चिंता सता रही थी| तो फिर ,सोचना क्या था?  ड्राइवर  को साथ लेकर मैं और मेरा बेटा चल पड़े गाय और उसके शिशु को घर लाने| गंतव्य पर पहुंच कर जैसे ही ड्राइवर ने गाय के बच्चे को गोदी में उठाने की कोशिश की, पास ही में बैठी उसकी मां फुर्ती से उठ खड़ी हुई| परंतु ,मुझे और मेरे बेटे को देखकर कुछ शांत हुई| किसी तरह हम लोग गाय और उसके बच्चे को लेकर घर तक पहुंचे| हमारे घर में खुली जगह बहुत है| पीछे की तरफ आंगन में शेड के नीचे गाय को एक खूंटी से बांध दिया गया | बच्चा चूंकि  छोटा ही था तो उसे बांधने की आवश्यकता नहीं थी| बच्चे को प्यार से हम सब गोपाला कहकर बुलाने लगे| वह दिनभर  पूरे  लॉन में स्वच्छंद घूमता रहता और हम सभी उसको देख कर आनंदित होते| घर में एक तोता भी था जो गोपाला को देखकर मिट्ठू मिट्ठू बोलने लगता|  इस तरह पूरे 10 दिन तक गोपाला अपनी मां के साथ हमारे घर में रहा एवं मेरा और मेरे बेटे का गाय पालने का शौक पूरा हुआ|

     ब्लॉग पढ़ने के लिए धन्यवाद|

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